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Saturday, 15 April 2017

Dr BhimRav Ambedkar biography in Hindi | डॉ. भीमराव अम्बेडकर जीवनी

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भारतीय संविधान के शिल्पकार और आज़ाद भारत के पहले न्याय मंत्री थे। सामाजिक भेदभाव के विरोध में कार्य करने वाले सबसे प्रभावशाली लोगो में से एक Dr. Br Ambedkar थे। विशेषतः बाबासाहेब आंबेडकर – भारतीय न्यायविद, अर्थशास्त्री, राजनेता और समाज सुधारक के नाम से जाने जाते है। महिला, मजदूर और दलितों पर हो रहे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाने और लढकर उन्हें न्याय दिलाने के लिए भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को सदा आदर से स्मरण किया जाते है।
भीमराव रामजी आंबेडकर जो विश्व विख्यात है। जिन्होंने अपना पूरा जीवन बहुजनो को उनका अधिकार दिलाने में व्यतीत किया। उनके जीवन को देखते हुए निच्छित ही यह लाइन उनपर सम्पूर्ण रूप से सही साबित होगी –
“जीवन लम्बा होने की बजाये महान होना चाहिये ” DR AMBEDKAR

डॉ. भीमराव अम्बेडकर जीवनी – Dr. Br Ambedkar Biography in Hindi

पूरा नाम    – भीमराव रामजी अम्बेडकर
जन्म        – 14 अप्रेल 1891
जन्मस्थान – महू. (जि. इदूर मध्यप्रदेश)
पिता        – रामजी
माता        – भीमाबाई
शिक्षा       – 1915  में एम. ए. (अर्थशास्त्र)। 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में से PHD। 1921 में मास्टर                    ऑफ सायन्स। 1923  में डॉक्टर ऑफ सायन्स।
विवाह         – दो बार, पहला रमाबाई के साथ (1908 में) दूसरा डॉ. सविता कबीर के साथ (1948 में)
भीमराव रामजी आम्बेडकर का जन्म ब्रिटिशो द्वारा केन्द्रीय प्रान्त (अब मध्यप्रदेश) में स्थापित नगर व सैन्य छावनी मऊ में हुआ था। वे रामजी मालोजी सकपाल जो आर्मी कार्यालय के सूबेदार थे और भीमाबाई की 14 वी व अंतिम संतान थे। उनका परिवार मराठी था और वे अम्बावाड़े नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में है, से सम्बंधित था। वे हिंदु महार (दलित) जाती से संपर्क रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे और उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था।
 जाता था।
आंबेडकर के पूर्वज लम्बे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता, भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा में थे ओ यहाँ काम करते हुए वो सूबेदार के पद तक पहुचे थे। उन्होने अपने बच्चो को स्कूल में पढने और कड़ी महेनत करने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। स्कूली पढाई में सक्षम होने के बावजूद आम्बेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चो को विद्यालय में अलग बिठाया जाता था और अध्यापको द्वारा न तो ध्यान दिया जाता था, न ही उनकी कोई सहायता की। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने पर कोई उची जाती का व्यक्ति उचाई से पानी उनके हातो पर डालता था, क्यू की उनकी पानी और पानी के पात्र को भी स्पर्श करने की अनुमति नहीं थी। लोगो के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक आंबेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था। बाद में उन्होंने अपनी इस परिस्थिती को “ना चपरासी, ना पानी” से लिखते हुए प्रकाशित किया।
1894 में रामजी सकपाल सेवानिर्वुत्त हो जाने के बाद वे सहपरिवार सातारा चले गये और इसके दो साल बाद, आंबेडकर की माँ की मृत्यु हो गयी। बच्चो की देखभाल उनकी चची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुए की। रामजी सकपाल के केवल तिन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियों मंजुला और तुलासा। अपने भाइयो और बहनों में केवल आंबेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए ओर इसके बाद बड़े स्कूल में जाने में सफल हुए। अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव आंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे, उनके कहने पर अम्बावडेकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर आंबेडकर जोड़ लिया जो उनके गाव के नाम “अम्बावाड़े” पर आधारित था।
भीमराव आंबेडकर को आम तौर पर बाबासाहेब के नाम से जाने जाता हे, जिन्होंने आधुनिक बुद्धिस्ट आन्दोलनों को प्रेरित किया और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध दलितों के साथ अभियान चलाया, स्त्रियों और मजदूरो के हक्को के लिए लड़े। वे स्वतंत्र भारत के पहले विधि शासकीय अधिकारी थे और साथ ही भारत के संविधान निर्माता भी थे।
आंबेडकर एक बहोत होशियार और कुशल विद्यार्थी थे, उन्होंने कोलम्बिया विश्वविद्यालय और लन्दन स्कूल ऑफ़ इकनोमिक से बहोत सारी क़ानूनी डिग्री प्राप्त कर रखी थी और अलग-अलग क्षेत्रो में डॉक्टरेट कर रखा था, उनकी कानून, अर्थशास्त्र और राजनितिक शास्त्र पर अनुसन्धान के कारण उन्हें विद्वान की पदवी दी गयी. उनके प्रारंभिक करियर में वे एक अर्थशास्त्री, प्रोफेसर और वकील थे। बाद में उनका जीवन पूरी तरह से राजनितिक कामो से भर गया, वे भारतीय स्वतंत्रता के कई अभियानों में शामिल हुए, साथ ही उस समय उन्होंमे अपने राजनितिक हक्को और दलितों की सामाजिक आज़ादी, और भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए अपने कई लेख प्रकाशित भी किये, जो बहोत प्रभावशाली साबित हुए। 1956 में उन्होंने धर्म परिवर्तन कर के बुद्ध स्वीकारा, और ज्यादा से ज्यादा लोगो को इसकी दीक्षा भी देने लगे।
1990 में, मरणोपरांत आंबेडकर को सम्मान देते हुए, भारत का सबसे बड़ा नागरिकी पुरस्कार, “भारत रत्न” जारी किया। आंबेडकर की महानता के बहोत सारे किस्से और उनके भारतीय समाज के चित्रण को हम इतिहास में जाकर देख सकते है।

एक नजर में बाबासाहेब अम्बेडकर की जानकारी – Dr BR Ambedkar in Hindi

1920 में ‘मूक नायक’ ये अखबार उन्होंने शुरु करके अस्पृश्यों के सामाजिक और राजकीय लढाई को शुरुवात की।
1920 में कोल्हापुर संस्थान में के माणगाव इस गाव को हुये अस्पृश्यता निवारण परिषद में उन्होंने हिस्सा लिया।
1924 में उन्होंने ‘बहिष्कृत हितकारनी सभा’ की स्थापना की, दलित समाज में जागृत करना यह इस संघटना का उद्देश था।
1927 में ‘बहिष्कृत भारत’  नामका पाक्षिक शुरु किया।
1927 में महाड यहापर स्वादिष्ट पानी का सत्याग्रह करके यहाँ की झील अस्प्रुश्योको पिने के पानी के लिए खुली कर दी।
1927 में जातिव्यवस्था को मान्यता देने वाले ‘मनुस्मृती’ का उन्होंने दहन किया।
1928 में गव्हर्नमेंट लॉ कॉलेज में उन्होंने प्राध्यापक का काम किया।
1930 में नाशिक यहा के ‘कालाराम मंदिर’ में अस्पृश्योको प्रवेश देने का उन्होंने सत्याग्रह किया।
1930 से 1932 इस समय इ इंग्लड यहा हुये गोलमेज परिषद् में वो अस्पृश्यों के प्रतिनिधि बनकर उपस्थिति रहे। उस जगह उन्होंने अस्पृश्यों के लिये स्वतंत्र मतदार संघ की मांग की। 1932 में इग्लंड के पंतप्रधान रॅम्स मॅक्ड़ोनाल्ड इन्होंने ‘जातीय निर्णय’ जाहिर करके अम्बेडकर की उपरवाली मांग मान ली।
जातीय निर्णय के लिये Mahatma Gandhi का विरोध था। स्वतंत्र मतदार संघ की निर्मिती के कारण अस्पृश्य समाज बाकी के हिंदु समाज से दुर जायेगा ऐसा उन्हें लगता था। उस कारण जातीय निवडा के तरतुद के विरोध में गांधीजी ने येरवड़ा (पुणे) जेल में प्रनांतिक उपोषण आरंभ किया। उसके अनुसार महात्मा गांधी और डॉ. अम्बेडकर बिच में 25 डिसंबर 1932 को एक करार हुवा। ये करार ‘पुणे करार’ इस नाम से जाना है। इस करारान्वये डॉ. अम्बेडकर ने स्वतंत्र मतदार संघ की जिद् छोडी। और अस्पृश्यों के लिये कंपनी लॉ में आरक्षित सीटे होनी चाहिये, ऐसा आम पक्षियों माना गया।
1935 में डॉ.अम्बेडकर को मुंबई के गव्हर्नमेंट लॉ कॉलेज के अध्यापक के रूप में चुना गया।
1936 में सामाजिक सुधरना के लिये राजकीय आधार होना चाहिये इसलिये उन्होंने ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ स्थापन कि।
1942 में ‘शेड्युल्ट कास्ट फेडरेशन’ इस नाम के पक्ष की स्थापना की।
1942 से 1946 इस वक्त में उन्होंने गव्हर्नर जनरल की कार्यकारी मंडल ‘श्रम मंत्री’ बनकर कार्य किया।
1946 में ‘पीपल्स एज्युकेशन सोसायटी’ इस संस्थाकी स्थापना की।
डॉ. अम्बेडकर ने घटना मसौदा समिति के अध्यक्ष बनकर काम किया। उन्होंने बहोत मेहनत पूर्वक भारतीय राज्य घटने का मसौदा तयार किया। और इसके कारण भारतीय राज्य घटना बनाने में बड़ा योगदान दिया। इसलिये ‘भारतीय राज्य घटना के शिल्पकार’ इस शब्द में उनका सही गौरव किया जाता है।
स्वातंत्र के बाद के पहले मंत्री मंडल में उन्होंने कानून मंत्री बनकर काम किया।
1956 में नागपूर के एतिहासिक कार्यक्रम में अपने 2 लाख अनुयायियों के साथ उन्होंने बौध्द धर्म की दीक्षा ली।
Br Ambedkar Awards – पुरस्कार : 1990  में ‘बाबा साहेब’ को देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।
Br Ambedkar Death – मृत्यु : 6 दिसंबर 1956 को लगभग 63 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया।
जिस समय सामाजिक स्तर पर बहुजनो को अछूत मानकर उनका अपमान किया जाता था, उस समय आंबेडकर ने उन्हें वो हर हक्क दिलाया जो एक समुदाय को मिलना चाहिये। हमें भी अपने आसपास के लोगो में भेदभाव ना करते हुए सभी को एक समान मानना चाहिये। हर एक इंसान का जीवन स्वतंत्र है, हमें समाज का विकास करने से पहले खुद का विकास करना चाहिये। क्योकि अगर देश का हर एक व्यक्ति एक स्वयं का विकास करने लगे तो, हमारा समाज अपने आप ही प्रगतिशील हो जायेंगा।
हमें जीवन में किसी एक धर्म को अपनाने की बजाये, किसी ऐसे धर्म को अपनाना चाहिये जो स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारा सिखाये।

Wednesday, 12 April 2017

हेनरी फोर्ड की जीवनी | Henry Ford Biography In Hindi

हेनरी फोर्ड / Henry Ford एक अमेरिकन उद्योगपति, फोर्ड मोटर कंपनी के संस्थापक और मास (Mass) उत्पादन असेंबली लाइन के स्पोंसर भी थे।

हेनरी फोर्ड की जीवनी / Henry Ford Biography In Hindi


फोर्ड ने पहली ऑटोमोबाइल कंपनी विकसित की और निर्मिती भी की जिसे अमेरिका के मध्यम वर्गीय लोग भी आसानी से ले सकते थे। उनके द्वारा निर्मित ऑटोमोबाइल कंपनी को उन्ही के उपनाम पर रखा गया था और जल्द ही इस कंपनी ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना ली और साधारण ऑटोमोबाइल कंपनी ने जल्द ही बहुमूल्य कार बनाना शुरू किया और 20 वी शताब्दी में अपनी एक प्रभावशाली छाप छोड़ी। इसके बाद उन्होंने मॉडल टी नामक गाड़ी निकाली जिसने यातायात और अमेरिकी उद्योग में क्रांति ला दी।

फोर्ड कंपनी के मालक होने के साथ ही दुनिया के सबसे धनि और समृद्ध लोगो में से एक थे। उन्हें “फोर्डीजम” की संज्ञा भी दी गयी थी। फोर्ड अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी व्यापकता को बढ़ाना चाहती थी इसीलिए उन्होंने अपनी गाडियों की कीमतों में कमी कर बहुत से ग्राहकों को आकर्षित भी किया था। इसके बाद फोर्ड की फ्रेंचाईसी भी उत्तरी अमेरिका के बहुत से भागो में खोली गयी। उन्होंने अपनी अधिकांश संपत्ति भी फोर्ड फाउंडेशन के नाम पर कर दी थी और ऐसी व्यवस्था भी करा दी थी की वह स्थायी रूप से उनके ही परिवार के नियंत्रण में बनी रहे।

प्रारंभिक जीवन –

हेनरी फोर्ड का जन्म 30 जुलाई 1863 को मिशिगन के ग्रीनफ़ील्ड फार्म में हुआ था। असल में उनका परिवार इंग्लैंड के सॉमरसेट से था। फोर्ड के 15 साल की आयु में ही उनके माता-पिता की मृत्यु हो गयी थी। हेनरी फोर्ड के भाई-बहनों में मार्गरेट फोर्ड (1867-1938), जेन फोर्ड (1868-1945), विलियम फोर्ड (1871-1917) और रोबर्ट फोर्ड (1873-1934) शामिल है।

किशोरावस्था में उनके पिताजी ने उन्हें एक जेब घडी दी थी। 15 साल की आयु में फोर्ड पूरी तरह गिर चुके थे लेकिन दोस्त और पड़ोसियों की सहायता से वे फिर उठकर खड़े हुए और घडी ठीक करने वाले के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनायी।

परिस्थिति को देखकर उनके पिता उन्हें पारिवारिक फार्म देना चाहते थे लेकिन फोर्ड को फार्म पर काम करना पसंद नही था। बाद में उन्होंने लिखा की, “मुझे कभी भी फार्म से प्यार ही नही था – बल्कि फार्म में काम करने वाली मेरी माँ से मुझे प्यार था।”

1879 में जेम्स एफ. फ्लावर & ब्रदर्स और बाद में 1882 में ड्राई डॉक कंपनी के साथ काम करने के लिये उन्होंने घर छोड़ दिया था। बाद में उन्होंने वेस्टिंगहाउस में भी स्टीम इंजन पर काम किया। इस समय में फोर्ड ने गोल्डस्मिथ, ब्रायंट & स्ट्रेटन बिज़नस कॉलेज में बुककीपिंग का भी अभ्यास किया था।

विवाह और परिवार –

फोर्ड ने क्लारा जेन ब्रायंट (1866-1950) से 11 अप्रैल 1888 को हुई थी और उनकी पत्नी की सहायता से ही वे एक सॉमिल भी चलाते थे। उनका एक बेटा भी है : एड्सेल फोर्ड (1893-1943)।

करियर –
1891 में फोर्ड एडिसन ज्ञानवर्धन कंपनी के इंजिनियर बने। 1893 में मुख्य इंजिनियर के रूप में उनका प्रमोशन होने के बाद उनके पास पर्याप्त समय और पैसे दोनों थे। और तभी उन्होंने गैसोलीन इंजन पर खोज करना भी शुरू किया। उनकी यह खोज 1896 में पूरी हुई और उन्होंने एक गाड़ी का भी निर्माण किया जिसका नाम फोर्ड क्वैडसाइकिल रखा गया था। उन्होंने 4 जून को इसका सफल प्रशिक्षण भी किया था। बहुत सी टेस्ट ड्राइव के बाद फोर्ड ने अपनी क्वैडसाइकिल में बहुत से सुधार भी किये।

1896 फोर्ड ने एडिसन के एग्जीक्यूटिव की मीटिंग भी अटेंड की, वहाँ उनका परिचय थॉमस एडिसन से हुआ था। वहाँ उन्होंने फोर्ड ऑटोमोबाइल के प्रोजेक्ट को सभी के सामने रखा। एडिसन ने उनके इस प्रोजेक्ट को सराहना भी की और फोर्ड के आकार और गाड़ी बनाने का काम भी 1898 में पूरा हुआ। डेट्रॉइट लंबर बैरन विलियम एच. मर्फी की पूँजी के समर्थन से चलने वाले फोर्ड ने एडिसन कंपनी से इस्तीफा भी दे दिया था और 5 अगस्त 1899 को नयी डेट्रॉइट ऑटोमोबाइल कंपनी की स्थापना भी की थी। उस समय पहले कम गुणवत्ता वाली गाडियों के निर्माण में भी बहुत लागत लगती थी इसी वजह से उनकी कीमत भी ज्यादा होती थी। इसी वजह से इस कंपनी को सफलता नही मिल सकी और जनवरी 1901 में कंपनी खत्म हो गयी थी।

बाद में सी. हेरोल्ड विल्स की सहायता से फोर्ड को फिर से डिजाईन किया गया, इसे पुनर्निर्मित किया गया और सफलतापूर्वक अक्टूबर 1901 में 26 हॉर्सपावर के साथ चलाया गया था। इसी सफलता के साथ मर्फी और दुसरे सहकर्मियों ने डेट्रॉइट ऑटोमोबाइल कंपनी को बदलकर हेनरी फोर्ड कंपनी की स्थापना 30 नवम्बर 1901 को को की थी, जिसकी फोर्ड मुख्य इंजिनियर थे। 1902 में फोर्ड के कंपनी छोड़कर चले जाने के बाद मर्फी ने फिर से कंपनी का नाम बदलकर किडिलैक ऑटोमोबाइल कंपनी रखा।

1902 में ही 8+ हॉर्सपावर के साथ फोर्ड ने साइकिलिस्ट कूपर के साथ मिलकर रेस “999” में जीत भी हासिल की। इसके बाद फोर्ड को एलेग्जेंडर व्हाय. मलकोम्सों का समर्थन मिला जो डेट्रॉइट के ही कोल्-डीलर थे। उन्होंने पार्टनरशिप में फोर्ड & मलकोम्सों लिमिटेड की स्थापना भी की जो ऑटोमोबाइल का उत्पादन करती थी। इसके बाद फोर्ड बहुमूल्य गाडियों के निर्माण और उन्हें डिजाईन करने में लग गये।


रोचक बाते –

• अल्दौस हक्सले के ब्रेव न्यू वर्ल्ड (1932) में फोर्डीस्ट का आयोजन किया। और तभी फोर्ड ने अपने पहले मॉडल टी का भी अनावरण किया।
• ओप्टन सिंक्लैर ने 1937 में फोर्ड की काल्पनिक कहानी का वर्णन अपने नॉवेल दी फ्लिवर किंग में किया था।
• बहुत से इतिहासिक नॉवेल में फोर्ड का उपयोग किसी व्यक्तिगत चरित्र को दर्शाने के लिये भी किया गया था, जिसने मुख्य रूप से इ.एल. डोक्टोरो का रागटाइम (1975) और रिचर्ड पॉवर का नॉवेल थ्री फार्मर ऑन दी वे ऑफ़ डांस (1985) शामिल है।
• 1986 में रोबर्ट लकी की बायोग्राफी में फोर्ड, उनके परिवार और उनकी कंपनी तीनो का ही वर्णन था और उसका शीर्षक था, “फोर्ड : दी मैन एंड दी मशीन” इस किताब को 1987 में अपनाया गया था।
• 2005 में इतिहासिक उपन्यास दी प्लाट अगेंस्ट अमेरिका में फिलिप रोथ ने फोर्ड को एक बहुदिमागी व्यक्तित्व भी बताया था।
• ब्रिटिश लेखक डगलस गालब्रेथ ने फोर्ड के शांति जहाज का उपयोग उपन्यास किंग हेनरी (2007) के मौत की जगह के रूप में किया था।
• 2008 में ही फोर्ड ने दुनिया में अपनी पहचान बनवा ली थी और दुनिया की सबसे कीमती और बहुमूल्य गाड़िया बनाने वाली कंपनियों में भी शामिल हो गयी।
• 1946 में वे ऑटोमेटिव हॉल ऑफ़ फेम भी रह चुके है।
• समस्वर संगीतकार फेर्ड़े ग्रोफ़ ने हेनरी फोर्ड के सम्मान में एक टोन कविता की रचना भी की थी।

Friday, 7 April 2017

फ्लिप्कार्ट का इतिहास - History of Flipkart in hindi

An attractive neutral name is what we looked for. Good domain names were hard to get. We were looking at names that did not just speak of books alone, but one that could suit any category of products that we may add in future. Also, we wanted to have a catchy name with high recall potential. Flipkart could in simple terms mean ‘Flipping things into your Kart’


फ्लिप्कार्ट का इतिहास (Flipkart History)

इंडस्ट्रीजप्राइवेट कम्पनी
उत्पत्ति  2007
जनक  सचिन बंसल व बिन्नी बंसल
मुख्यालयबैंगलोर,कर्नाटक, इंडिया
सेवाए  ई-कॉमर्स (ऑनलाइन सर्विसेज)
स्लोगन  “अब हर Wish होगी पूरी .”
परिचय (Introduction)
Flipkart 2007 मे बंसल ब्रदर्स के द्वारा चालू गई एक e-commerce कंपनी की शुरूवात थी और उन्होंने सफलता भी हासिल की. जिसे मुख्य रूप से सिंगापुर मे रजिस्टर्ड किया गया है तथा इंडिया के बैंगलोर (कर्नाटक) मे इसका मुख्यालय है.

बंसल ब्रदर्स ने भारतीय प्रोद्योगिक संस्थान, दिल्ली द्वारा अपनी शिक्षा पूरी की है. शिक्षा पूरी करने के बाद अमेज़न (Amazon) पर काम करके अनुभव प्राप्त किया. अपने सपनोँ को सच करने के लिये अपने बुलंद होसलों के साथ मात्र 4 लाख रुपयों से अपनी e-commerce कंपनी की शुरूवात की. जिसमे आज लगभग तैतीस हजार (33000) कर्मचारी कार्यरत है. बहुत ही कम समय में कामयाबी हासिल कर पुरे विश्व की सफल कंपनियों मे से एक बनी. सबसे पहली वस्तु किताबे थी, जिससे अपनी वेबसाइट पर लाया गया था. धीरे-धीरे सभी चीजों की शुरूवात की गई.
अनुमानित लाभ
किसी भी कम्पनी के बारे मे बिल्कुल सही लाभ की जानकारी देना मुश्किल ही नही असंभव है. हम सिर्फ अनुमानित आकड़े ही बता सकते है, जो कम्पनी ने राजस्व के रूप मे हासिल किया है.
  • 2008 मे, 4 करोड़ लगभग .
  • 2009 मे, 20 करोड़ लगभग .
  • 2010 मे, 75 करोड़ लगभग .
  • 2011 से, 31 मार्च 2012 तक, 500 करोड़ लगभग कहा जाता है.
  • 2015 मे, लगभग 5000 करोड़ का टारगेट था कम्पनी का.
Flipkart की सफलता का मंत्र
सफलता व असफलता एक ही सिक्के के दो पहलु है. हर व्यक्ति को अपने जीवन मे, दोनों का सामना करना होता है. असफलताओ के समय, डट कर उसका सामना करना, अपने आप मे, भविष्य की बहुत बड़ी सफलता की घोषणा करना है. Flipkart भी बिल्कुल उसी तरह है. इसकी सफलता के अपने ही मूल मंत्र है. जैसे-
  • आसान सेवा देना – Flipkart ने शुरूवात से अपने ग्राहकों को बहुत ही आसान सेवाओ का लाभ दिया है. जिससे सामान बुलाने मे कोई भी परेशानी नही होती है.
  • आसान वेबसाइट – वेबसाइट का आसानी से कोई भी उपयोग कर सकता है.
  • सेवाए – घर पहुच बेहतर सेवाए देकर अपने ग्राहकों को सन्तुष्ट किया है.
  • भुगतान के कई तरीके – Cash on Delivery (COD) तथा सभी प्रकार के कार्ड की सुविधाओ को चालू कर भुगतान की प्रकिया को आसान कर दिया है.
इस प्रकार Flipkart ने 2007 से अब तक समय-समय पर बदलाव कर ग्राहकों को अच्छी सेवाए देकर बहुत अच्छे लाभ के साथ वैश्वीकरण के युग मे खुद की साख को बरकरार रखा है.

Wednesday, 5 April 2017

Bhagat Singh Biography Quotes in Hindi शहीद भगत सिंह



BIOGRAPHY BHAGAT SINGH IN HINDI – सरदार भगत सिंह

जब शक्ति का दुरूपयोग हो तो वो हिंसा बन जाती है, लेकिन जब शक्ति का प्रयोग किसी सही कार्य में किया जाये तो वो न्याय का ही एक रूप बन जाती है। ये क्रांतिकारी विचार थे, महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह के। उनका कहना था कि कोई भी त्याग हमारी मातृभूमि की आजादी से बड़ा नहीं है, आज हम स्वतंत्र भारत में जी रहे हैं, ये इन्हीं लोगों का त्याग है। जब भारत की आजादी के किस्से सुने जाते हैं तो भगत सिंह का नाम ही सबसे ऊपर आता है। तो आइये जानें सरदार भगत सिंह के बारे में और उनके जीवन से प्रेरणा लेने की कोशिश करें | 

History of Bhagat Singh – 
सरदार भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर 1907 को पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम किशन सिंह और माँ विद्यवती थीं, ये एक सिख परिवार से थे और इनके परिवार के लोगों में भी देशभक्ति की भावना थी। भगत सिंह के जन्म के समय ही इनके पिता और 2 चाचा जेल से आजाद हुए थे जो पहले से मातृभूमि की आजादी के लिए प्रयास कर रहे थे। बचपन से ही भगत सिंह को देशभक्ति की भावना वाला माहौल मिला और इसी तरह इस भावना ने उनके जेहन में एक गहरी छाप छोड़ी। वीर भगत सिंह सपने में भी देश की आजादी के बारे में सोचा करते। जिस इंसान के अंदर बचपन से ही इतनी देशभक्ति की भावना हो, उससे बड़ा देशभक्त कोई दूसरा हो ही नहीं सकता।

Legend Bhagat Singh भगत सिंह का एक क्रांतिकारी विचार –

“मेरा जन्म एक पवित्र कार्य के लिए हुआ है, देश की आजादी ही मेरा परम धर्म है
मेरे लिए कोई आराम नहीं है और मुझे मेरे लक्ष्य से कोई नहीं रोक सकता”


इंनके दादा इतने स्वाभिमानी थे कि उन्होंने ब्रिटिश स्कूल में भगत सिंह को पढ़ाने से मना कर दिया तो गाँव के ही आर्य समाज के स्कूल में इनकी बाल्य शिक्षा हुई ।

1919 में जब जलियाँ वाला कांड हुआ जिसमें हजारों निहत्थों पर गोलियाँ चलाई गयीं, उन दिनों भगत सिंह मात्र 12 साल के थे इस घटना ने उनके आक्रोश को बहुत बढ़ावा दिया। इसके बाद मात्र 14 साल की उम्र में, जब 20 फरवरी 1921 को गुरुद्वारा नानक साहिब पे लोगों पर गोलियाँ चलाई गयीं तो भगत सिंह ने इसके विरोध में प्रदर्शनकारियों में हिस्सा लिया। एक तरफ जहाँ महात्मा गांधी ने अहिंसा का विचार रखा था वहीं 1922 में जब चौरा चौरी हत्याकांड हुआ तो भगत का खून खौल उठा और उन्होंने मात्र 15 साल की उम्र में युवा क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लिया और ये उस गुट के सरदार भी बने।

भगत सिंह के जीवन से जुडी एक घटना है, भगत सिंह की माँ अक्सर देखा करती थीं कि वो एक अगरबत्ती लेकर रोज के छोटे कमरे में जाते और कमरा अंदर से बंद करके घंटों अंदर ही रहते। एक दिन जब भगत सिंह अगरबत्ती लेकर कमरे में दाखिल हुए तो माँ ने जिज्ञासावश एक कोने से अंदर देखा तो उनका कलेजा भर आया। भगत सिंह के एक हाथ में अगरबत्ती थी और सामने भारत माँ की तस्वीर टंगी थी और भगत सिंह फूट फूट कर रो रहे थे। उनकी आँखों में एक चमक थी आजादी की चमक। वो बार बार भारत माँ से वादा कर रहे थे कि माँ मैं अपने प्राणों की आहुति देकर तुझे आजाद कराऊंगा। ये देखकर माँ का सीना गर्व से फूल गया। ऐसे थे हमारे सरदार भगत सिंह, अगर उनके जीवन की 1 भी बात हमने जीवन में ढाल ली तो निश्चित आज उनको याद करना सफल होगा।

23 मार्च 1931 को उनके नाम के आगे एक पदवी और जोड़ी गयी- “शहीद”, शहीद भगत सिंह। 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को एक साथ फांसी की सजा सुनाई। भगत सिंह चाहते तो माफ़ी माँगकर फाँसी की सजा से बच सकते थे लेकिन मातृभूमि के इस सच्चे सपूत को झुकना पसंद नहीं था और मात्र 23 वर्ष की उम्र में इस वीर सपूत ने हँसते हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया। ऐसे देश प्रेमियों को कोटि कोटि नमन.………

Tuesday, 4 April 2017

Satya Nadella Biography CEO of Microsoft



जन्म: 19 अगस्त 1967, हैदराबाद, आंध्र प्रदेश
कार्यक्षेत्र: वरिष्ठ आई.टी.एग्जीक्यूटिव, माइक्रोसॉफ्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.इ.ओ.)
नागरिकता: अमेरिकन
शिक्षा:  BS, MSCS, MBA
शिक्षण संस्थान: मनिपाल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय (मिल्वौकी), बूथ स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट (शिकागो विश्वविद्यालय)
भारतीय-अमेरिकी सत्य नडेला विश्व की प्रमुख सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) हैं। 4 फरवरी 2014 में उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट के पूर्व सीईओ स्टीव बामर का स्थान लिया। सीईओ बनने से पहले वे माइक्रोसॉफ्ट के क्लाउड और एंटरप्राइज ग्रुप के एग्ज़ीक्युटिव वाइस प्रेजिडेंट थे। भारत में पैदा हुए और पले बढ़े सत्य नडेला वर्तमान में अमेरिकी नागरिक हैं। माइक्रोसॉफ्ट में आने से पहले सत्य नाडेला सुन माइक्रोसिस्टम्स में कार्य कर रहे थे। उन्होंने सन 1992 में माइक्रोसॉफ्ट ज्वाइन किया और कंपनी के लगभग हर एक महत्वपूर्ण डिवीज़न और पद पर कार्य किया।
प्रारंभिक जीवन
सत्य नारायण नाडेला का जन्म 19 अगस्त 1967 में हैदराबाद के एक तेलुगु परिवार में हुआ। उनके पिता बुक्कापुरम नाडेला युगांधर भारतीय प्रशासनिक सेवा में एक अधिकारी थे। सत्य नाडेला ने हैदराबाद स्थित बेगमपेट के हैदराबाद पब्लिक स्कूल से शिक्षा ग्रहण की। स्कूल पूरा करने के बाद उन्होंने मनिपाल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (मंगलोर यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध) में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए दाखिला लिया। उन्होंने सन 1988 में अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद सत्य नडेला अमेरिका चले गए जहाँ पर उन्होंने विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय (मिल्वौकी) में कंप्यूटर साइंस में एम.एस. करने के लिए दाखिला लिया। सन 1990 में उन्होंने ये डिग्री हासिल कर ली और उसके बाद शिकागो विश्वविद्यालय के बूथ स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट से एम.बी.ए. की पढ़ाई की।
नडेला को बचपन से ही चीजों को बनाने का शौक था और जैसे-जैसे वे बड़े हुए उनको ये पता चल गया कि उनका भविष्य कंप्यूटर साइंस में ही था पर मनिपाल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में वो मौका उपलब्ध नहीं था इसलिए उससे मिलता-जुलता विषय चुना जिसने उनके प्रिय विषय को समझने और जानने में मदद की।
करियर
अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सत्य नाडेला ने सन माइक्रोसिस्टम्स में कंपनी के टेक्नोलॉजी टीम में काम किया। कुछ समय सन माइक्रोसिस्टम्स में कार्य करने के बाद उन्होंने सन 1992 में माइक्रोसॉफ्ट ज्वाइन कर लिया और तब से वे उसी के साथ हैं।
माइक्रोसॉफ्ट में करियर
सत्य नडेला ने सन 1992 में माइक्रोसॉफ्ट ज्वाइन किया और तभी से वे कंपनी के साथ जुड़े हैं। कंपनी के साथ इतने लम्बे वक्त तक जुड़े रहने के दौरान उन्होंने कई योजनाओं पर कार्य किया। माइक्रोसॉफ्ट में उनकी शुरुआत सर्वर ग्रुप से हुई थी। इसके बाद वे सॉफ्टवेयर डिवीज़न, ऑनलाइन सर्विसेज, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, एडवरटाइजिंग प्लेटफार्म में कार्य किया और फिर मुखिया बनकर सर्वर डिवीज़न में वापस आ गए।
उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट में क्लाउड कंप्यूटिंग का नेतृत्व किया और कंपनी को दुनिया के सबसे बड़े क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर में से एक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने ऑनलाइन सर्विसेज डिवीज़न में बतौर वरिष्ठ उपाध्यक्ष और माइक्रोसॉफ्ट बिज़नस डिवीज़न में बतौर उपाध्यक्ष कार्य किया। बाद में उन्हें कंपनी के 19 अरब अमेरिकी डॉलर ‘सर्विस एंड टूल’ व्यवसाय का अध्यक्ष बना दिया गया। उन्होंने कंपनी के इस डिवीज़न का स्वरुप परिवर्तित कर दिया। माइक्रोसॉफ्ट के डेटाबेस, विंडोज सर्वर और डेवलपर टूल्स को माइक्रोसॉफ्ट अज्योर क्लाउड प्लेटफार्म पर लाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेत्रत्व में इस डिवीज़न का मुनाफा सन 2011 में 16.6 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर  सन 2013 में लगभग 20.3 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनने से पहले माइक्रोसॉफ्ट में अपने करियर के दौरान सत्य नडेला ने इन प्रमुख पदों पर कार्य किया:
  • सर्वर और टूल्स डिवीज़न के अध्यक्ष (फरवरी 2011 – फरवरी 2014)
  • ऑनलाइन सर्विसेज डिवीज़न में बतौर वरिष्ठ उपाध्यक्ष (मार्च 2007 – फरवरी 2011)
  • माइक्रोसॉफ्ट बिज़नस डिवीज़न के उपाध्यक्ष
  • बिज़नस सोल्युसंस एंड सर्च एंड एडवरटाइजिंग प्लेटफार्म के कॉर्पोरेट उपाध्यक्ष
  • क्लाउड और एंटरप्राइज प्रभाग के कार्यकारी उपाध्यक्ष
व्यक्तिगत जीवन

सत्य नडेला ने सन 1992 में अनुपमा से विवाह किया। अनुपमा सत्य के पिता के मित्र की पुत्री हैं। नडेला दंपत्ति के तीन संतान हैं – एक बीटा और दो बेटियां। सत्य अपने परिवार के साथ वाशिंगटन में रहते हैं।

नडेला को काव्य का बहुत शौक है और वे अमरीकी और भारतीय काव्य के उत्सुक पाठक हैं। उन्हें क्रिकेट का भी बहुत शौक है। वे अपने स्कूल क्रिकेट टीम का सदस्य भी थे। उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया है कि क्रिकेट के खेल से उन्होंने नेतृत्व और आपसी सहयोग की भावना को सीखा है।

टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम)

1967: 19 अगस्त को हैदराबाद में जन्म हुआ
1988: सत्य नडेला ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की
1990: विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय (मिल्वौकी) में कंप्यूटर साइंस में एम.एस. किया
1992: माइक्रोसॉफ्ट ज्वाइन किया
1992: अनुपमा के साथ विवाह हुआ
2014: 4 फरवरी को माइक्रोसॉफ्ट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.इ.ओ.) बनाया गया

Monday, 3 April 2017

घर में न टीवी थी न कार, आज हैं दुनिया की दिग्गज कंपनी गूगल के सीईओ

यह कहानी है फर्श पर सोने वाले युवा सुंदर की जो आज गूगल का सीईओ बनकर अर्श पर हैं। सुंदर की कामयाबी की कहानी किसी परिकथा से कम नहीं।

वर्ष 1972 में चेन्नई (तब के मद्रास) में जन्मे सुंदर के पिता ब्रिटिश कंपनी जीईसी में इंजीनियर थे। उनका परिवार दो कमरों के एक मकान में रहता था।

उसमें सुंदर की पढ़ाई के लिए कोई अलग कमरा नहीं था। इसलिए वे ड्राइंग रूम के फर्श पर अपने छोटे भाई के साथ सोते थे। घर में न तो टेलीविजन था और न ही कार।

इससे उनके परिवार की आर्थिक हैसियत का अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन इंजीनियर पिता ने बचपन में अपने बेटे के मन में तकनीक के बीज बो दिए।

इसलिए तमाम अभाव भी सुंदर के आगे बढ़ने की राह में बाधा नहीं बन सके और महज 17 साल की उम्र में उन्होंने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास कर खड़गपुर में दाखिला लिया।

कहा जाता है कि पूत के पांव पालने में नजर आ जाते हैं। इसे चरितार्थ करते हुए आईआईटी, खड़गपुर से अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई (1989-93) के दौरान सुंदर हमेशा अपने बैच के टॉपर रहे। 

आईआईटी में सुंदर को पढ़ा चुके प्रोफेसर सनत कुमार राय बताते हैं, ‘मेटलर्जिकल एंड मैटेरियल साइंस की पढ़ाई के दौरान भी सुंदर इलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में विभिन्न विषयों पर काम कर रहे थे। वह भी उस दौर में जब आईआईटी के पाठ्यक्रम में इलेक्ट्रानिक्स था ही नहीं।‘ तब भी सुंदर का पहला प्यार तो इलेक्ट्रानिक्स ही था। 

आईआईटी के नेहरू हाल छात्रावास में रहने वाले सुंदर को याद करते हुए प्रोफेसर राय कहते हैं कि सुंदर बेहद सभ्य, विनम्र और मृदुभाषी हैं। वर्ष 1993 में फाइनल परीक्षा में भी अपने बैच में टॉप करने के साथ उन्होंने रजत पदक हासिल किया था। उसके बाद छात्रवृत्ति पाकर आगे की पढ़ाई के लिए वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय चले गए।

आईआईटी से निकलने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। विभिन्न कंपनियों में काम करते हुए उन्होंने कोई 11 साल पहले गूगल में नौकरी शुरू की थी। 

पिचाई के सहपाठी और बाद में उनके साथ गूगल में आठ साल तक काम करने वाले सेजार सेनगुप्ता कहते हैं, ‘गूगल में ऐसा एक भी व्यक्ति मिलना मुश्किल है जो सुंदर को पसंद नहीं करता हो या उनसे प्रभावित नहीं हो।‘ 

उनके एक अन्य सहपाठी पी. सुब्रमण्यम बताते हैं, ‘सुंदर के चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती और हमलोग मजाक में उसे किताबी कीड़ा कहते थे।‘

गूगल का सीईओ चुने जाने के बाद अब सुंदर पिचाई का नाम भले लोगों की जुबान पर है लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि आईआईटी में पढ़ाई के दौरान सभी उनको पी. सुंदरराजन के नाम से जानते थे। 

दो कमरों के मकान से निकल कर दुनिया की सबसे प्रमुख तकनीकी कंपनी के सीईओ तक का सुंदर का सफर किसी परीकथा से कम आकर्षक नहीं। अब हाल में उन्होंने चेन्नई में अपने माता-पिता के लिए करोड़ों की लागत वाला एक मकान खरीदा है।

आईआईटी खड़गपुर की हस्तियां -
आईआईटी खड़गपुर के मेटलर्जी विभाग से सुंदर की सफलता से पहले लंबे समय तक आईबीएम की रिसर्च डिवीजन के प्रमुख रहे प्रवीण चौधरी और वोडाफोन के सीआईओ रहे अरुण सरीन भी शामिल हैं।

गूगल का सीईओ बनने से पहले माइक्रोसाफ्ट के सीआईओ बनने की रेस में भी पिचाई का नाम शामिल था लेकिन बाद में उनकी जगह सत्य नडेला को चुना गया।

बीच में ट्विटर ने भी उनको अपने पाले में करने का प्रयास किया था लेकिन जानकारों के मुताबिक, गूगल ने 10 से 50 लाख मिलियन डालर का बोनस देकर उनको कंपनी में बने रहने पर सहमत कर लिया।


पिचाई के बारे में ये खास बातें


अच्छे क्रिकेटर : हाई स्कूल क्रिकेट टीम में कप्तानी करते हुए तमिलनाडु राज्य का क्षेत्रीय टूर्नामेंट जीता |

सम्मान मिले : पिचाई को साइबल स्कॉलर और पामर स्कॉलर उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है |

मजबूत पेशेवर : कंसल्टेंट कंपनी मैकिन्जी में कई साल काम किया, 2004 में गूगल सर्च ज्वाइन की |

तेज याददाश्त : करीबी लोग 1984 के भूले हुए टेलीफोन नंबर पूछते हैं तो सुंदर आज भी बता देते हैं |

मृदुभाषी : अमेरिकी मीडिया में उन्हें मृदुभाषी, कम मशहूर और लैरी पेज के दाएं हाथ के रूप में बताया |

टीम समर्पण : मरिसा मेयर के साथ काम करते वक्त टीम के प्रति समर्पण दिखाया और खुद को साबित किया|

जबरदस्त प्रतिभा : प्रसिद्ध अमेरिकी कंपनी रबा इंक ने उन्हें सलाहकार बोर्ड में बतौर सदस्य मनोनीत किया |

क्रोम लांच किया : क्रोम वेब ब्राउजर लांच किया और साल भर में वेब बेस्ड क्रोम ओएस भी नेटबुक्स के लिए लांच किया |

गूगल एप्स व एंड्रायड संभाला : 2012 में गूगल एप्स को संभाला और साल भर में एंड्रायड का पदभार भी संभाल लिया |

स्मरणीय कार्य : जीमेल, गूगल मैप एप्स बनाए, गूगल के सभी उत्पादों के लिए एंड्रायड एप भी तैयार किए  |

Saturday, 1 April 2017

गूगल क्या है Google kya hai, kaise bana hindi

Duinya ka sabse bada Search Engine GOOGLE Kaise Bana

Dosto aaju me aapko bataunga ki sabse bade search engine google ke bare me ki ye kaise bana . google ek internet business technology company hain  . google ko larry page aur sarje brain ne banaya tha , dosto jis time inhone is popular search engine ko banaya tha us waqt halat alag the ,1990 ke time yahoo aur lycos jaise search engine pehle se hi bahut popular the . lekin yahoo aur lycos me wo baat nahi thi jo larry aur sarje ke dimaag me chal raha tha .larry aur sarjechahte the ki wo ek aisa search engine banaye jisme search karte hi poularity ke hisaab se result mile taaki search karte hi pehle page ke 10 result me hi logo ko unki jaankaari mil jaaye .
In logo ne is technology ko ka naam pagerank rakha aur 1996 me “backrub” naam ka search engine bana liya . 1988 tak inhone 2.5 crore webpage ka database ready kar liya . august 1998 me larry page aur sarje ki mulaaqat sun microsystem ke co-founder se hui , laary page aur sarje ne apna plan samne rakha , inke is idea ko sunkar unhone 1 lakh dollar ka check google ke naam se kaat diya , ab aap jara sochiye ek aise company ke naam pe check kat jo abhi bani nahi thi . 
Aur is check ko bhunane ke liye 4 september 1998 ko larry aur sarje ne google naam se company ko asthaapit kiya aur iske naam se bank me account khola . aur tab shuruwaat hui google.inc ki . shuruwaat me larry aur sarje iska naam ‘backrub’ hi rakhna chahte the lekin fir isse massage parlour ka doubt ho sakta tha.
Google search engine banate waqt larry aur sarje satinfoard university me p.hd kar rahe the . iske vajh se unki padhai me problem aa rahi thi , iske liye wo ise bechna chahte the , isliye unhone excite ke CEO Jeorge bel ke saamne 10 lakh dollar me bechne ka prstaav rakha  , lekin bel ne mana kar diya , wo is liye kyu wo iske future ko nahi dekh paaye.
August 2004 me google ne apne ko share market me list kiya 85 dollar me jaari share October 2007 me 700 dollar ke ho gaye .  july 2000 me yahoo ka default search provider bana aur isi saal google ke paas 1 arab url index ho gaye . 2006 me google ne youtube kharid liya .
2007 me google ne mobile ke liye operating system ke liye android system banaya , jo bahut adhik popular hua , aaj android mobile ke market pe sabse adhik pakad hain . 2010 me nexus one smartphone bhi market me utara , 2010 me googleki income 29 arab thi .
“google का शब्द गुगोल से है ,जिसका मतलब है 1 के बाद 100 शून्य”
2006 nme oxford dictionary ne google word ko work ke rup me shaamil kiya .
Aaj google ke bahut se service hain jaise :-
Gmail , imagesearch , bloggers , google map , google earth , google+ , google translate , video chat . google ki sabse badi khaasiyat hain ki uska page bahut fast load hota hain  kyu ki uske homepage pe koi image nahi hota .Dosto aapne dekha ki kaise ek chote se idea ne sabse badi companyio ko piche chor diya .
Aaj google duniya ka sabse bada search engine hain .
To main aasha karta hu ki ye article padh ke aap kuch alag aur naya karne ki koshis karenge .